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*दिव्य ज्योति जागृति संस्थान फ़िरोज़पुर में महामाई संकीर्तन कथा का शुभारंभ*

*महिषासुर मर्दिनी की कथा अहंकार पर विजय और ब्रह्म ज्ञान के महत्व का देती है संदेश*

*दिव्य ज्योति जागृति संस्थान फ़िरोज़पुर में महामाई संकीर्तन कथा का शुभारंभ*
*दिव्य ज्योति जागृति संस्थान फ़िरोज़पुर में महामाई संकीर्तन कथा का शुभारंभ*
*महिषासुर मर्दिनी की कथा अहंकार पर विजय और ब्रह्म ज्ञान के महत्व का देती है संदेश*
फ़िरोज़पुर : 15-10-2026: दिव्य ज्योति जागृति संस्थान, फ़िरोज़पुर की ओर से नवरात्रों के पावन अवसर पर महामाई संकीर्तन कथा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के प्रथम दिवस श्री आशुतोष महाराज जी की परम शिष्या साध्वी दविंदर भारती जी ने महामाई का गुणगान करते हुए महिषासुर मर्दिनी की कथा के आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर किया। उन्होंने बताया कि यह कथा केवल देवी मां द्वारा महिषासुर के वध का वर्णन नहीं है, बल्कि मनुष्य के भीतर विद्यमान अहंकार और नकारात्मक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा भी देती है। साध्वी जी ने बताया कि महिषासुर अहंकार का प्रतीक है। जब मनुष्य के भीतर अहंकार बढ़ जाता है, तो वह अपनी वास्तविक पहचान और जीवन के आध्यात्मिक उद्देश्य को भूल जाता है। वह स्वयं को केवल शरीर, पद, प्रतिष्ठा और भौतिक उपलब्धियों तक सीमित समझने लगता है। ऐसे में मनुष्य के जीवन में आध्यात्मिक ज्ञान का विशेष महत्व है, जो उसे अपने वास्तविक स्वरूप का बोध करवाता है।
            उन्होंने पूर्ण संत की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य परमात्मा का साक्षात्कार करना है। इस परम सत्य का बोध केवल बाहरी कर्मकांडों तक सीमित रहने से नहीं, बल्कि पूर्ण संत की कृपा से प्राप्त होने वाले ब्रह्म ज्ञान के माध्यम से संभव होता है। पूर्ण संत मनुष्य को उसके घट के भीतर विद्यमान परमात्मा के ज्योति स्वरूप का साक्षात्कार करवाते हैं। जब साधक ब्रह्म ज्ञान के माध्यम से अपने अंतर्मन में उस दिव्य ज्योति का दर्शन करता है, तब उसकी आध्यात्मिक यात्रा का वास्तविक आरंभ होता है।
           साध्वी दविंदर भारती जी ने समझाया कि महामाई के विभिन्न स्वरूप हमें धर्म, शक्ति और सद्गुणों की प्रेरणा देते हैं। महामाई का ज्योति स्वरूप केवल बाहरी पूजा-अर्चना का विषय नहीं, बल्कि वह दिव्य सत्ता है, जिसका अनुभव पूर्ण संत के मार्गदर्शन में मनुष्य अपने भीतर कर सकता है। इस आंतरिक अनुभूति से मनुष्य के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है और वह अहंकार, क्रोध, लोभ तथा अन्य विकारों से ऊपर उठने की प्रेरणा प्राप्त करता है।
उन्होंने कहा कि पूर्ण संत मनुष्य को अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं। ब्रह्म ज्ञान के माध्यम से व्यक्ति को यह समझ आती है कि परमात्मा की सत्ता केवल मंदिरों और तीर्थस्थलों तक सीमित नहीं, बल्कि उसका साक्षात्कार मानव शरीर रूपी मंदिर के भीतर भी किया जा सकता है। यही ज्ञान भक्ति को वास्तविक अर्थ प्रदान करता है और मनुष्य को विनम्रता, प्रेम, करुणा तथा सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ाता है।
साध्वी जी ने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि नवरात्रों के पावन अवसर पर महामाई की आराधना के साथ अपने जीवन से अहंकार को दूर करने तथा पूर्ण संत के मार्गदर्शन में ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर आध्यात्मिक जीवन अपनाने का संकल्प लें।
कार्यक्रम के दौरान महामाई के भजनों और संकीर्तन से वातावरण भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालुओं ने पूरे श्रद्धाभाव से महामाई का गुणगान किया और आध्यात्मिक संदेशों को अपने जीवन में धारण करने की प्रेरणा प्राप्त की।

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